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In बस यूँ ही...चलते-चलते..., माँ

यादों के झरोखे से- कुछ अपनों के मन की (छह)

 विशेष- आज माँ के लिए कुछ अपनों की बातों और यादों के सिलसिले में प्रस्तुत है, मेरी बेहद खास और प्यारी सहेली- शिखा शुक्ला के मन की बातें...। शिखा मेरे बचपन की वो सहेली है, जिससे उम्र के एक काफ़ी आगे के पड़ाव पर आकर ही मिलना हो पाया। हम संपर्क में थे, बातें करते थे...लेकिन फिर भी मज़े की बात यह थी...

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In बस यूँ ही...चलते-चलते..., माँ

यादों के झरोखे से- कुछ अपनों के मन की (पाँच)

 विशेष- एक बहुत ही शांत, हँसमुख और विनम्र स्वभाव के श्री शराफ़त अली खान, जिन्हें मैं शराफ़त अंकल कहती हूँ, उनके साथ व्यक्तिगत जीवन की बहुत कम यादें ही मेरे पास हैं। जिस दौर के अपने कानपुर-प्रवास का ज़िक्र उन्होंने किया है, उस समय गोष्ठी से इतर भी किसी रविवार या शनिवार को उनके मेरे घर में आने की कुछ-कुछ याद मुझे है।...

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In बस यूँ ही...चलते-चलते..., माँ

यादों के झरोखे से - कुछ अपनों के मन की (चार)

 विशेष- हम कब, कहाँ और किससे कैसे मिलकर एक स्नेहासिक्त बंधन में बंध जाएँगे, यह हमें नहीं पता होता। अस्सी के दशक में माँ द्वारा गठित और संचालित कथा-साहित्य को समर्पित साहित्यिक-संस्था- यथार्थ- में नए-पुराने से लेकर देश भर के कई स्थापित साहित्यकारों ने समय-समय पर शिरकत की...कुछ ने तो अपने लेखन की शुरुआत ही ‘यथार्थ’ से की और आगे चलकर साहित्याकाश पर...

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In बेतरतीब पन्ने, माँ

यादों के झरोखे से - कुछ अपनों के मन की (तीन)

 विशेष- कानपुर के जिन साहित्यकारों को मैं लगभग अपने बचपन से जानती हूँ, श्री हरभजन सिंह मेहरोत्रा उनमें से एक हैं। स्वभाव से मितभाषी, विनम्र और सादगी-भरे हरभजन अंकल के साथ भी हमारा एक मन का रिश्ता रहा है। साहित्य से इतर पारिवारिक स्तर पर उनसे एक जुड़ाव बना रहा, उसके पीछे शायद एक वजह यह भी थी कि वे आम ज़िंदगी की...

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