पोते की मालिश करते हुए दादी की नज़र उसके खाली गले पर पड़ी तो वह गुस्से से चीख़ पड़ी," बहूऽऽऽ, ओ बहू...कहाँ मर गई...अरे...मुन्ने के गले की चेन कहाँ गई?"
आँगन में पडे ढेर सारे जूठे बर्तनों को साफ़ करती बहू के हाथ रुक गए। उसने जल्दी से नल खोल कर हाथ धोया और फिर दौडी हुई आई, "माँजी ...कल मुन्ने के हाथ में फँस कर चेन टूट गई थी...इस के पापा से सुनार के यहाँ भेज कर बनवा दूँगी...।"
"बड़ी आई बनवाने वाली...तेरी माँ से इतना भी नहीं हुआ कि कम-से-कम मुन्ने को तो कायदे की चीज़ देते...।अरे उन कँगलों ने तुझे कुछ नहीं दिया...मेरे बेटे और मैने तो अपने खोटे भाग्य पर संतोष कर लिया, पर यह मुन्ना...? बड़ा हो कर यह भी उन भिखमंगों पर शर्मिन्दा होगा...। दे मुझे यह चेन...इसे बेच कर मैं दूसरी बनवा दूँगी अपने मुन्ने राजा को...।"
बहू आँचल से खोल कर अपनी सास को चेन दे ही रही थी कि तभी दरवाज़े पर ज़ोर की दस्तक हुई। उसने जा कर दरवाज़ा खोला तो अवाक रह गई। सामने अपना सूटकेस लिए एकदम फटेहाल उसकी ननद खड़ी हुई थी।
ननद ने भाभी को सामने देखा तो लिपट कर फफक पडी," भाभीऽऽऽ, माँ ने संचित के जन्म पर जो सामान भेजा है, उसे ख़राब और सस्ता कह कर उन लोगों ने वापस कर दिया है और कहा है कि जब तक मैं बच्चे व उसके पापा के लिए सोने की मोटी चेन, घर के हर सदस्य के लिए पाँच जोड़ी कपड़े, बच्चे का पालना आदि, सासू माँ और ननद के लिए डायमण्ड की अंगूठी और इक्कीस टोकरी फल-मिठाई अपनी माँ से ले कर ना आऊँ,घर वापस न लौटूँ...। भाभी, अब तुम ही मेरा सहारा हो...भैया से कह कर तुम्हीं कुछ कर सकती हो... मुझे मेरे बच्चे से अब तुम्ही मिला सकती हो... माँ से तो कुछ होने से रहा अब...।"
ननद को वह सांत्वना दे ही रही थी कि तभी सासू माँ एकदम फट पड़ी," हरामज़ादेऽऽऽ... लड़केवाले हैं कि लुटेरे...अरे, यहाँ कोई ख़जाना गड़ा है क्या जो उन्हें लुटा दें...जितनी हैसियत होगी, आदमी उतना ही तो करेगा...। देखती हूँ तुझे वापस कैसे नहीं बुलाते...दहेज-उत्पीडन में फँसा न दिया तो मैं तेरी माँ नहीं....।"
ननद को अंदर कमरे की तरफ़ ले जाते हुए बहू सोच रही थी कि अपनी बेटी पर बात आई तो एक माँ के चेहरे पर चढ़ा सास का यह मुखौटा कितनी ज़ल्दी उतर गया।

