मैने देखे हैं सभी रंग दुनिया के...

Monday, February 23, 2015

आजकल कई दिनों से फ़ेसबुक में दिल्ली में लगे पुस्तक मेले की बहार छाई हुई थी...। जिसको देखो, उसी के चित्र...किस्से...यादें...। अच्छा लग रहा था ये सब देखना-पढ़ना...। मेरे जैसे वहाँ शामिल न हो पाए लोगों ने भी दूसरों की नज़र से लगभग पूरा मेला ही घूम लिया । किताबों के विमोचन के अलावा आजकल पुस्तक-मेलों में भी आम-सी बात हो चुकी कई गोष्ठियों की भी सचित्र-रिपोर्टिंग देखने को मिली । जब भी किसी गोष्ठी का चित्र और उसकी व्यक्तिगत रिपोर्टिंग पढ़ रही होती थी, दिलो-दिमाग़ में कई पुरानी यादें ताज़ा हो रही थी...वर्षों पुरानी...।

यादें थी माँ (प्रेम गुप्ता ‘मानी’) द्वारा स्थापित और लगातार चौदह वर्षों तक हर महीने कहानी-कविता गोष्ठी करने वाली माँ की साहित्यिक संस्था-यथार्थ- की गोष्ठियों की...। 23 जून, 1983 की शाम...यूँ ही चार-पाँच साथी कवियों-कहानीकारों की मौजूदगी में जाने कैसे माँ ने कथा साहित्य को समर्पित कानपुर की अकेली संस्था के रूप में ‘यथार्थ’ की नींव रख दी । अपने को खुद के वास्तविक स्तर से बहुत कमतर आंकने वाली नितान्त घरेलू महिला...मेरी माँ को सपने में भी गुमान नहीं था कि सबको साथ लेकर चलने और शहर में बिखरे हुए ढंग से मुलाकात करने वाले साहित्यकारों को एक साझे मंच पर लाने की उनकी यह छोटी-सी कोशिश साल- दो साल बीतते-बीतते किस मुकाम तक जा पहुँचेगी...।

हर महीने निरन्तर होने वाली कथा-गोष्ठियों ने तीन-चार महीनों में सबका ध्यान अपनी ओर खींचना शुरू कर दिया था । कविता से जुड़ी तो कई संस्थाएँ तब भी थी, पर कथा-कहानी को लेकर इस नई और गम्भीर पहल का बहुत खुले दिल से स्वागत हुआ । चार लोगों से माँ के घर के एक कमरे में शुरू हुई ‘यथार्थ’ में हर महीने नए लोग जुड़ते जा रहे थे । गोष्ठियाँ हमारे घर पर ही होती थी, माँ के आत्मीय व्यवहार के कारण  उनमें एक पारिवारिक माहौल रहता था । हर महीने दो कहानियाँ पढ़ी जाती थी, जिन पर खूब जम कर आलोचनात्मक चर्चा-समीक्षाएँ होती...। सार्थक बहसें होती...स्वस्थ वाद-विवाद होता...माँ के भरपूर आतिथ्य का आनन्द लेकर अगली गोष्ठी के लिए एक तारीख़ तय हो जाती...। ‘यथार्थ’ के लिए माँ का बनाया एक नियम था...आलोचना को बिल्कुल स्वस्थ और खुले दिल से स्वीकारना होगा, बहस होगी पर शालीनता के दायरे में...। यही वजह था कि ‘यथार्थ’ की गोष्ठियों में अपनी नई कहानी पढ़ने के लिए लोग उत्सुक हुआ करते थे । एक तरफ़ उसमें न केवल कानपुर और आसपास के वरिष्ठ और प्रतिष्ठित लेखक पूरी शिद्दत से आते थे, बल्कि उसकी गोष्ठियों की जानकारी पाकर न जाने कितने नए लोग, नई कलमें खुद ही गोष्ठी में आकर संस्था की नियमित मेलिंग-लिस्ट में जोड़े जाने की ख़्वाहिश जताते थे...और माँ खुशी-खुशी उनको भी इस ‘यथार्थ परिवार’ में शामिल कर लेती थी । ‘यथार्थ’ में अपनी पहली रचना पढ़ने वाले ऐसे जाने कितने लोग आज देश के जाने-माने साहित्यकार के रूप में अपनी पहचान बनाए हुए हैं...। दो-तीन साल के बाद तो यह स्थिति हो गई थी कि हर महीने अमूमन चालीस-पचास लेखकों के साथ होने वाली गोष्ठी में किसी महीने भूलवश कोई सूचित किए जाने  से रह जाता था, तो गोष्ठी के अगले दिन उसका घर आना तय था । ये कहने...मानी जी, क्या हो गया भई, नाराज़ हैं क्या किसी बात से जो अबकी गोष्ठी की सूचना नहीं दी...।

जाड़ा-गर्मी-बरसात...हर मौसम में बिला नागा होने वाली गोष्ठियाँ सिर्फ़ मेरे इम्तिहान के समय रुका करती थी । माँ ने अपनी सारी प्राथमिकताओं में घर-परिवार को सबसे पहले नम्बर पर रखा था । उस दौर को बहुत करीब से देख चुके कुछ शुभचिन्तक आज भी माँ को टोंक देते हैं...अगर बाकी महिला लेखिकाओं की तरह आपने भी अपने लेखन को सबसे ऊपर रखा होता तो आज स्थिति दूसरी ही होती...। माँ हर बार या तो हँस के बात टाल देती हैं या फिर इतना भर बोल देती हैं...हर कोई एक जैसा नहीं होता । मेरे लिए मेरी बेटी, मेरा घर-परिवार हमेशा से पहले नम्बर पर रहे हैं, कैरियर या बाकी कुछ हमेशा दोयम रखा है मैने...।

बात सही थी बिल्कुल...। न केवल परिवार के आगे अपने लेखन को दोयम रखा उन्होंने, बल्कि अपने ‘यथार्थ परिवार’ के सदस्यों के आगे भी उन्होंने अपनी स्थिति हमेशा ‘बैकफुट’ रखी । मासिक गोष्ठियों की तो छोड़िए, साल में कम-से-कम एक बार काफ़ी बड़े स्तर पर होने वाली गोष्ठी में भी माँ बाकी सबको लाइमलाइट में ला खुद पीछे ही रहती थी । ‘जो दिखता है, वो बिकता है’ वाला मार्केटिंग का फ़ण्डा साहित्य में भी चलता है, ये उन्होंने न जाना, न माना । उनका तो अपना ही अलग फ़ण्डा था...प्रतिभा खुद बोलती है...। इसी लिए गोष्ठी चाहे मासिक हो या वार्षिक, उन्होंने कई लोगों के समझाने के बावजूद हमेशा सिर्फ़ पर्दे के पीछे से सब प्रबन्धन सम्हाला, आगे बढ़ के उस का लाभ नहीं उठाया । मुझे अच्छे से याद है, एक बार जोशी अंकल (श्री मनोहरश्याम जोशी जी ) ने मम्मी की कई कहानियाँ पढ़ने के बाद मुझसे कहा था, तुम्हारी मम्मी चुपचाप जितना अच्छा लिख लेती हैं न...अगर उतनी ही सशक्तता से वो आगे आकर अपनी उपस्थिति भी दर्ज़ कराएँ तो ही कुछ बात बनेगी । पर माँ के सहज-सरल दिल-दिमाग ने उनकी भी यह बात कभी नहीं मानी ।

इतनी गोष्ठियों में न केवल राष्ट्रीय स्तर पर ख़्याति पाए हुए पद्मश्री श्री क्षेमचन्द्र सुमन, अवधनारायण मुद्गल, सुश्री चित्रा मुद्गल, नरेन्द्र कोहली, डॉ. कमलकिशोर गोयनका, शराफ़त अली खान आदि शामिल हुए बल्कि देश को कानपुर की देन कह सकूँ, ऐसे नामचीन श्री गिरिराज किशोर, राजेन्द्र राव, स्व. श्री नरेशचन्द्र चतुर्वेदी, डॉ.सुमन राजे, श्रीनाथ, उद्भ्रांत और प्रियम्वद जैसे साहित्यकार भी ‘यथार्थ’ के एक अटूट हिस्से के रूप में लगातार शामिल होते रहे । सिर्फ़ हिन्दी साहित्यकार ही नहीं, बल्कि अन्य भाषाओं-पंजाबी और उर्दू- के प्रतिष्ठित लेखक भी पूरी सक्रियता से गोष्ठियों का हिस्सा बनते थे । इंटरनेशनल कथाकार श्री गगन पाकिस्तानी जब भी भारत आते,जितने महीने रुकते, ‘यथार्थ’ की गोष्ठी में शिरकत किए बिना न जाते । शारीरिक रूप से तो नहीं, पर मानसिक रूप से ‘यथार्थ’ से जुड़े अंतर्राष्ट्रीय ख़्यातिप्राप्त और कई सम्मानों से नवाज़े गए विख़्यात चित्रकार श्री भाऊ समर्थ के रेखाचि्त्रों ने ‘यथार्थ’ की अनियतकालीन पत्रिका और इसी के बैनर तले प्रकाशित कई संग्रहों के कवर पेज़ के रूप में उसकी शोभा बढ़ाई...।

                                 (यथार्थ की मासिक कथा-गोष्ठी में प्रियंवद जी से कुछ बात करती माँ )

वक़्त बीता...। चौदह साल तक लगातार गोष्ठी चलाने के बाद पारिवारिक और स्वास्थ्य-सम्बन्धी उलझनों में माँ कुछ ऐसा फँसी, कि धीरे-धीरे पहले तो गोष्ठियाँ अनियमित हुई, फिर कुछेक साल के अन्दर माँ ने गोष्ठियाँ करना लगभग बन्द ही कर दिया । ‘यथार्थ’ के ठप्प-सा हो जाने ने न जाने कितने लोगों की असली रंगत दिखा दी । पर माँ ने कभी न तो किसी से स्वार्थवश व्यवहार रखा, न ही किसी से बैर या ईर्ष्या की भावना मन में आने दी ।

आज मैं ये मान कर चलती हूँ कि ‘यथार्थ’ का सफ़र अभी ख़त्म नहीं हुआ है...। एक लम्बा ठहराव भले आया है, पर मंज़िल तक जाना तो अभी बाकी ही है...। ‘यथार्थ’ के साथ बीता वो उतार-चढ़ावों से भरा एक खुशनुमा सफ़र जल्द ही एक बार फिर जारी होगा, एक नई उम्मीद...एक नई ऊर्ज़ा...और एक नए विश्वास के साथ...क्योंकि किसी ने कहा भी तो है न...
तू थक के न बैठ, कि तेरी उड़ान बाकी है
ज़मीन ख़त्म हुई, अब आसमान बाकी है...।

(डॉ. हरवंश प्रसाद शुक्ल, श्री नरेशचन्द्र चतुर्वेदी, श्री गिरिराज किशोर, डॉ. सुमन राजे मंचासीन और माइक पर प्रेम गुप्ता `मानी'...`यथार्थ' की एक वार्षिक गोष्ठी में...)


              ( इसी वार्षिक गोष्ठी में अपने विचार प्रस्तुत करते हुए स्व. डॉ. नरेशचन्द्र चतुर्वेदी जी...)


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2 comments

  1. Waaaaah...ye to bahut achhii reporting hui..Ye sab halka fulka to maloom chalte rahta tha tumse...aaj itne detail mein maaloom chala :)

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  2. मानी जी की यही सादगी आपमें भी है । आपका गद्य मुझे प्रभावित और आकर्षित करता है । बिना गहरे आत्ममन्थन के गद्य का रूप नहीं सँवरता ।सबसे बड़ा काम तो मानी जी का यही है कि आप उनके पदचिह्नों पर चल रही हैं।

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