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Monday, February 13, 2012

क्या यह सही है...


प्रिय मित्रों,
आज मैं आपके साथ हाल में ही अपनी एक सहेली के साथ हुई एक घटना का जिक्र करना चाहूँगी। बात मेरे ही मोहल्ले की है, सो जो कुछ हुआ उसे काफ़ी हद तक मैने भी देखा और जाना...।




घटना असल में मेरी सहेली के बेटे और मेरी एक दूसरी परिचिता की बेटी से जुड़ी है। एक बहुत ही मामूली सी बात का बतंगड़ कैसे बनाया जाता है, यह घटना इस बात का बहुत ज्वलन्त उदाहरण है। मेरे मोहल्ले में किशोरावस्था में प्रवेश कर चुके बहुत बच्चे हैं, जो शायद तीन-चार साल की उम्र से साथ खेलते बड़े हुए हैं। उनमें से ज्यादातर एक ही स्कूल में पढ़ते भी हैं...कई तो एक ही क्लास में...। सो सब बच्चे एक ही बस में, एक ही स्टॉप से साथ-साथ जाते हैं। लाजमी है कि उनमें दोस्ताना अधिक ही है...। सो बस में भी हँसी-मज़ाक, धौल-धप्पा, एक-दूसरे के साथ सीट लेने की जद्दोजहद दूसरे बच्चों से कुछ ज्यादा ही है...।

तो मैं बात कर रही थी उन लड़का-लड़की की...। लड़की ने अभी पिछले ही साल अपना पुराना स्कूल बदल कर इस लड़के के स्कूल में दाखिला ले लिया। दोनो हम‍उम्र हैं, सो क्लास भी एक...बस सेक्शन अलग मिले...। किसी को कहीं कुछ भी बदला नहीं लग रहा था...। हाँ, ये दोनो बच्चे ज़रूर खुश हुए कि अब पढ़ाई में और आसानी होगी। एक नागा करेगा तो दूसरा तो है ही मदद को...। बस में भी अब दोनो एक दूसरे के साथ बैठने लगे थे...रास्ते भर कभी पढ़ाई, कभी दोस्तों, तो कभी यूँ ही किसी बात पर चर्चाएँ होने लगी...। स्टॉप पर बेटे को लेने-छोड़ने मेरी सहेली हमेशा जाती है। उन दोनो बच्चों की आपसी छेड़छाड़ में मेरी सहेली या उस स्टॉप पर आने वाली किसी और मम्मी को कभी कोई आपत्तिजनक बात नहीं लगी...न कभी किसी और बच्चे ने उन दोनो की किसी हरकत पर कोई एतराज़ जताया...।


चार-छः महीना सब ठीक ही चल रहा था कि अचानक एक दिन बच्चों की बस बदल कर दूसरी बस आने लगी। बच्चे वही थे, वही स्टॉप और वही माहौल...। पर बस की एक टीचर की नज़र में कुछ भी नॉर्मल नहीं था। मेरी सहेली का बेटा कुछ मज़ाकिया और मिलनसार स्वभाव का है...। माँ ने उसे कभी दुनिया के फ़रेब में नहीं डाला...। हाँ, क्या अच्छा है, क्या बुरा...सही-ग़लत वह उसे हमेशा समझाती है। बच्चों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्द्धा, लड़के-लड़की के बीच स्वस्थ मित्रता के लिए मेरी सहेली ने उसे कभी नहीं रोका...। शायद यही कारण है कि मेरी सहेली को अपने बेटे की सहेलियों के बारे में भी पता है...। उसने कभी बेटे के मन में विपरीत लिंग को लेकर हौव्वा नहीं डाला, क्योंकि उसका मानना है कि वर्ज़ित फल को चखने की चाह इंसान में ज़्यादा ही होती है, सो बेहतर है कि फल को वर्ज़ित करने की बजाय इंसान को यह पता होना चाहिए कि उस फल से क्या लाभ या हानि हो सकती है...ऐसे में इंसान हमेशा अपनी अंतरात्मा की सुनेगा और अंतरात्मा के फैसले ज़्यादातर सही ही होते हैं...। मेरी सहेली ने अपने बेटे को हमेशा अच्छे संस्कार दिए हैं और उसे भरोसा है कि शायद पूरी ज़िन्दगी में यही संस्कार उसे राह दिखाएँगे...।


पर बस में मौज़ूद वह टीचर दुनिया को थोड़े संकीर्ण नज़रिए से परखने पर यकीन करती हैं। उनकी निगाह में किसी भी उम्र के लड़के-लड़की में सिर्फ़ एक ही रिश्ता हो सकता है...ग़लत...। उन्हें दोनो बच्चों के एक साथ बैठने पर एतराज़ हुआ, सहेली को पता चला, उसने समझौतावादी रुख़ अपनाते हुए दोनो बच्चों को अलग बैठने की सलाह दी...। बेकार टीचर को नाराज़ क्यों करें...। उसे यह भी लगा, शायद यह दोनो बहुत शोर मचा लेते होंगे जिससे टीचर परेशान हो जाती होंगी...। पर फिर टीचर ने दोनो की आपसी बोलचाल भी बन्द करने को कह दिया...। पर दुनिया की गन्दी निगाह से बेखबर दोनो बच्चों ने इस बात को गम्भीरता से नहीं लिया। वे दोनो वैसे ही बोलते रहे...। जब वह टीचर अनुपस्थित हो जाती तो दोनो साथ बैठ भी जाते । पर बात उस दिन बिगड़ गई जब करीब आ रहे इम्तहान की तैयारी के लिए लड़के ने स्कूल से तीन दिनों की छुट्टी ले ली। उसकी कम्प्यूटर की कॉपी स्कूल में खो गई थी, सो उसने उस लड़की की कॉपी ली थी। चूँकि उसने वीक-एण्ड में छुट्टी ली थी तो मेरी सहेली ने ही उसे सलाह दी कि बस आने के समय चल कर फोटोकॉपी करा वह कॉपी उस लड़की को स्टॉप पर ही वापस कर दे ताकि उसे भी पढ़ने का हर्जा न हो। बेटे के साथ मेरी सहेली भी स्टॉप पर गई थी । टीचर ने बस रुकने पर मेरी सहेली को पूरी तरह नज़र‍अन्दाज़ करते हुए निगाह सिर्फ़ दोनो बच्चों पर गड़ाए रखी । उन्होंने मन में पूरी फ़िल्मी कल्पना कर डाली जहाँ हीरो हीरोइन को कुछ दिन न देखने पर बेचैन हो दुनिया की निगाहों से छिप कर उससे मिलने पहुँचता है...मैं तुझसे मिलने आई मन्दिर जाने के बहाने...स्टाइल...।


दूसरे दिन स्कूल पहुँच कर उस टीचर ने यह बात उन बच्चों की क्लास इंचार्ज तक पहुँचा दी...और भी न जाने किस-किस टीचर तक वह बात पहुँची...। क्लास इंचार्ज ने पहले तो उस लड़की को बुला कर सफ़ाई माँगी, फिर उन्होंने अपने सामने उस टीचर द्वारा पेश की गई बात लड़की की मम्मी को फोन करके बताई । इस अचानक वार से बौखलाई मम्मी को कुछ नहीं सूझा तो उन्होंने कह दिया कि वे दोनो बच्चे तो एक-दूसरे के भाई-बहन जैसे हैं...। खैर, उन टीचर ने उन्हें हिदायत दी कि जब तक दूसरी टीचर का शक़ दूर नहीं होता तब तक दोनो बच्चे आपस में बात न करें।

उन परिचिता ने यह बात तुरन्त मेरी सहेली को बताई...। सुन कर मेरी सहेली और उसका बेटा दोनो ही टेन्शन में आ गए...। बच्चा इस बात से परेशान था कि आज तक जैसा व्यवहार वह अपने दोस्तों से करता आ रहा था, वैसा ही तो उसके साथ भी कर रहा था...। फिर ऐसी चक्कर चलने वाली बात बीच में कहाँ से आ गई...? हार कर आखिर मेरी सहेली को भी अपने बेटे से कहना पड़ा कि अब से वह लड़कियों से थोड़ा दूरी ही बना कर चले, वरना आज बात इस लड़की की है, कल को दूसरी होगी...। इस बात का असर उन बच्चों पर इतना गहरा पड़ा कि जो बच्चे सहजता से एक-दूसरे के साथ हँस-बोल रहे थे, वही अपराधी की तरह आमना-सामना होने पर एक-दूसरे से मुँह फेर कर बैठ गए...। यही नहीं, बल्कि उसे बड़ा जान कर स्टॉप की एक मम्मी ने अपनी पाँच साल की बेटी का बस में ध्यान रखने की जिम्मेदारी मेरी सहेली के बेटे को दे रखी थी, उसने अब वह भी लेने से इंकार कर दिया यह कहते हुए कि ‘आण्टी, इसे मैं बच्चा समझ कर कई बार अपने ही पास बैठा लेता हूँ, पर किसी दिन मैम इसे लेकर भी मेरी बेइज्ज़ती न कर दें...। आप इसको देखे रहने का जिम्मा किसी और को सौंप दीजिए...।’


आगे क्या होगा, हम नहीं जानते...पर मेरी सहेली ने जो सवाल मेरे सामने उठाए, उन्हीं सवालों को मैं आपसे  भी करना चाहूँगी कि क्या इस दृष्टिकोण से हम बच्चों के साफ़, स्वस्थ मस्तिष्क में एक ग़लत बात नहीं भर रहे...? जिन बच्चों ने आपस में हँसते-खेलते समय शायद एक-दूसरे को इस नज़र से देखा भी नहीं हो, उन्हें अपराधी महसूस करा कर क्या हम आइन्दा उन्हें विपरीत सेक्स के साथ सहज रहने की हिम्मत दे पाएँगे...? क्या एक लड़के और लड़की की स्वस्थ दोस्ती को भी समाज की बुरी नज़र से बचाने के लिए उसे भाई-बहन का नाम देना ज़रूरी है...? क्या वह टीचर पूरे स्कूल में उनकी बदनामी कर के अपना अच्छे शिक्षक होने का दायित्व पूरा कर रही हैं...? क्या यह लिंग-भेद को बढ़ावा नहीं कि अब वे ही नहीं, बल्कि इस घटना से वाकिफ़ हो चुके उस स्टॉप के बाकी बच्चे भी आपस में बोलने या बैठने से पहले यह देखने लगे हैं कि वे किसके साथ बैठ रहे...? क्या अब दो दोस्त सिर्फ़ इस कारण एक-दूसरे की मदद नहीं करेंगे कि उनमें से एक लड़का है तो दूसरी लड़की...?

इन सवालों के जवाब क्या होंगे, इनकी प्रतीक्षा मुझे भी रहेगी...।

Wednesday, January 25, 2012

अच्छे लोग भुलाए नहीं जाते...


                                                        
         नया साल २०१२ जब आया तो बहुतों के लिए नई खुशियाँ, नई उमंगें लाया...पर यह खुशी, यह चहकन, यह उमंग अब की बरस हमारी गली ने महसूस नहीं किया...। न कोई कार्ड, न बधाई संदेश, न फोन...किसी माध्यम से भी किसी ने इस आते हुए साल की बधाई किसी को नहीं दी...। देते भी कैसे, जब इस साल ने आने के, या यूँ कहिए, कि २०११ ने जाने से ग्यारह दिन पहले हमारे मोहल्ले के एक सर्वप्रिय बुजुर्ग को हमसे अचानक ही छीन लिया...। कहने को उम्र ने उन्हें बुजुर्ग किया था, पर मन तो उनका अब भी वही था...मासूम बच्चे सा खिलखिलाने वाला, जवानों सा सदा खुश रहने वाला...। अपने परिवार से बेहद प्यार करने वाले, हर व्यसन से दूर रहने वाले मोंगा अंकल को मोहल्ले की बेटियाँ जितनी प्यारी थी, उतना ही प्यार उन्होंने अपनी बहू नीतू को भी दिया...। जिस बहू की आँखें उनके जाने के महीने भर बाद भी ‘डैडी जी’ की बात करते समय भर आए, गला रुंध सा जाए, उस बहू को उनसे कितना प्यार-दुलार मिला होगा, यह भी क्या बताने वाली बात है...?
          मैं बात कर रही हूँ स्वर्गीय श्री इंद्रराज मोंगा जी की...यानि कि मेरे मोंगा अंकल...। लम्बा कद, बहुत गोरा रंग, आकर्षक व्यक्तित्व के मालिक थे मोंगा अंकल...। अब भी इतने अच्छे लगते थे कि देखने वाला बरबस ही कह देता था कि जवानी में निश्चय ही बिल्कुल हीरो की तरह रहे होंगे...।


          मूलतः रावलपिण्डी के रहने वाले मोंगा अंकल का परिवार विभाजन के बाद भारत आ गया था। वैसे तो उनका लगभाग सारा जीवन ही हिन्दुस्तान में बीता, पर गाहे-बगाहे अपने बहुत छुटपन के रावलपिण्डी के दिन भी उन्हें याद आ जाते थे। उनकी बातें बड़ी रोचक हुआ करती थी। धीरे-धीरे बोलने वाले मोंगा अंकल अचानक ही कोई ऐसी बात कहते कि सामने वाला खिलखिला कर हँस पड़ता...। बेहद खुशदिल इंसान थे वो...। मोहल्ले में ही क्या, कभी उनके परिवार वालों ने भी उन्हें किसी से तेज़ आवाज़ में बोलते या गुस्सा करते नहीं देखा था...। कभी किसी की बुराई करते भी हमने नहीं देखा था। उर्दू के बहुत अच्छे जानकार थे वो...सो मोहल्ले की ही एक बेटी को जब अपनी नौकरी के लिए उर्दू की जानकारी लेने की आवश्यकता महसूस हुई तो वह सीधे मोंगा अंकल के ही पास पहुँची थी...। एक दिन जब बातों-बातों में मैने उन्हें अपनी उर्दू पढ़े होने की बात बताई थी, तो वे बहुत खुश हुए थे...और फिर न जाने कितनी देर तक हम दोनो उर्दू की ही बातें करते रहे थे...। उन्होंने मुझसे भी कहा था, कभी उर्दू में कुछ न आ रहा हो, तो बेझिझक पूछ लेना। वे हमेशा मदद करने को तैयार रहते थे...।
         NSI  कानपुर में Chief Designing Officer की पोस्ट से रिटायर होने वाले मोंगा अंकल किसी समय में डॉक्टर बनना चाहते थे, पर ऐसा हुआ नहीं, सो हमेशा आगे बढ़ जाने वाले मोंगा अंकल ने कभी इस बात का मलाल भी नहीं किया। हाँ, biology में उनका ज्ञान और रुचि वैसे ही बनी रही। आज भी मुझे याद है कि कुछ साल पहले छुट्टियों में मेरे बेटे को biology का एक प्रोजेक्ट मिला था, जिसमें वह कुछ अटक गया था। मुझे मोंगा अंकल की याद आई थी और उन्होंने हर संभव मदद भी की थी।
        पेड़-पौधों से उन्हें बेहद लगाव था। न केवल अपने घर की बागवानी का पूरा जिम्मा उन्होंने ले रखा था, बल्कि जब हमारे घर के सामने वाले पार्क का नवीनीकरण करने की ज़िम्मेदारी नगर निगम ने स्थानीय लोगों को सौंप दी, तो उसके लिए भी डिज़ाइन मोंगा अंकल ने ही तैयार किए। जब तक वे रहे, रोज़ ही पार्क में दिखते थे...कभी किसी पेड़ को संवारते हुए, कभी माली से किसी पेड़ के बारे में विचार-विमर्श करते हुए...।
         जितने अच्छे ढंग से उन्होंने बगीचे को संवार रखा था, उतने ही साफ़-सुथरे, रौनक भरे वे खुद भी रहा करते थे। उनकी पत्नी यानि कि कंचन आँटी अक्सर कहा करती थी कि उन्हें गन्दे रूप में तो पूरे जीवन में उन्होंने नहीं देखा। सुबह तड़के ही उठ कर वे शेव करके, नहा-धोकर तैयार हो जाया करते थे। उनका यह क्रम उनकी अन्तिम साँस तक चला।
         २० दिसम्बर २०११ की शाम पाँच बजे जब मोंगा अंकल के पड़ोस में रहने वाली खरे आँटी का फोन मेरे पास आया, मोंगा अंकल नहीं रहे, मैं सन्न रह गई...। उस समय रजाई में दुबकी मैं सो रही थी, सो लगा, कुछ ग़लत सुन लिया...। ऐसा कैसे हो सकता है...? दोपहर को ही तो छत से मैने उन्हें उनके बगीचे में देखा था, पेड़ की किसी पीली पड़ गई पत्ती को तोड़ते हुए...अच्छे-भले...। मुझे लगा, खरे आँटी शायद उनकी तबियत खराब होने के बारे में कह रही, मैं नींद से उठने के कारण समझ नहीं पा रही...। दो-तीन बार उनसे पूछा...हर बार वही...मोंगा अंकल नहीं रहे...।
          मैने दौड़ कर मम्मी को बताया...सुन कर वे भी अवाक रह गई...। उनका भी वही सवाल...ग़लत तो नहीं सुन लिया...? वे तुरन्त कंचन आँटी के पास भागी। मुझसे कहा, तुम भी चलो, नीतू को संभाल लेना...तुम्हारी इतनी अच्छी सहेली है, पर मैं भरे गले से बस इतना ही कह पाई, आप जाइए...मैं नहीं जा पाऊँगी...। मैं मोंगा अंकल को ऐसे नहीं देख पाऊँगी...। जो मेरे पहुँचने पर सोते से भी उठ कर आए हैं, उन मोंगा अंकल को हमेशा के लिए सोता देखना...मेरे बस की बात नहीं...।
          जिसने भी सुना, हतप्रभ रह गया। हर किसी के पास उनकी सिर्फ़ अच्छी यादें ही थी, क्योंकि बुरा तो उन्होंने किसी का किया ही नहीं था। उनके न रहने पर कंचन आँटी बस एक बात ही कह-कह कर, उन्हें याद करके रो रही थी कि ‘भगवान ने उन्हें एक तराशा हुआ हीरा दिया था, जो उनसे छिन गया...।’
          सच ही तो कह रही थी आँटी...सच्ची में तराशा हुआ हीरा थे मोंगा अंकल...शायद भगवान को भी अपने मुकुट में सजाने के लिए उस हीरे की ज़रूरत पड़ गई हो...।

Tuesday, November 15, 2011

नमस्कार,
कल बाल-दिवस था, यानि की बच्चों का दिन...| कई दिनों से मेरे कुछ मित्र मुझसे इस बात का आग्रह कर रहे थे कि मैं अपनी कुछ बाल-रचनाएँ भी इस ब्लॉग पर डालूँ...| उनकी बात भी सही है...| आखिर मैंने बचपन में लेखन की शुरुआत ही बाल रचनाओं से की थी...| तो अपने मित्रों का आग्रह पूरा करने का इससे अच्छा  अवसर क्या होगा...|
वैसे क्या सोचने का विषय यह नहीं है कि बच्चों के नाम, इस देश की भावी पीढ़ी के नाम, सिर्फ एक दिन...?


बालकथा
                                       दुनियादारी सीखी गुलाब ने
                                                                                                        प्रियंका गुप्ता




           सुबह की पहली किरण के साथ गुलाब की नन्ही-सी कली ने अपनी आँखें खोल कर धीरे से बाहर झाँका। ओस की बूंद उसकी आँखों में गिर पड़ी तो कली ने घबरा कर अपनी पंखुड़ियाँ फैला दी। अपनी लाल-लाल कोमल पंखुड़ियों पर वह खुद ही मुग्ध हो गई। थोड़ी देर इधर-उधर का नज़ारा देखने के बाद उसे कहीं से बातें करने की आवाज़ सुनाई दी। घूम कर देखा तो जूही और बेला के फूल आपस में बतिया रहे थे। गुलाब ने भी उनसे बातें करनी चाही,"बड़े भाइयों,"मैं भी आपसे बात करना चाहता हूँ...।"
           "तुम बेटे...अभी बच्चे हो," जूही -बेला के फूलों ने विनोद से झूमते हुए कहा,"थोड़ी दुनियादारी सीख लो तब शामिल होना हमारी मंडली में...।"
           वे फिर आपस में बातें करने लगे तो गुलाब ने सिर को झटका दिया,"हुँ...बच्चा हूँ...। कैसी बोरियत भरी दुनिया है...। क्या मेरा कोई दोस्त नहीं है...?" दुःखी होकर उसने सिर झुका लिया।

           "दुःखी क्यों होते हो दोस्त," कहीं से बड़ी प्यार-भरी आवाज़ आई,"हम तुम्हारे दोस्त हैं न...। तुम्हारे लिए हम पलकें बिछाए हुए हैं। आओ, हमारे दोस्त बन जाओ...।"
           गुलाब ने सिर उठा कर चारो तरफ़ देखा। कौन बोला ये? फिर अचानक काँटों को अपनी ओर मुख़ातिब पा उसने मुँह बिचका दिया,"दोस्ती और तुमसे...? शक्ल देखी है अपनी...? क्या मुकाबला है मेरा और तुम्हारा? न मेरे जैसा रूप, न कोमलता...और उस पर से मेरे लिए पलकें बिछाए बैठे हो...। न बाबा न, तुम्हारी पलकें तो मेरे नाजुक शरीर को चीर ही डालेंगी।"
           गुलाब की कड़वी बातों ने काँटों का दिल ही तोड़ दिया। पर उसे बच्चा समझ उन्होंने उसे माफ़ कर दिया और मुस्कराते रहे पर बोले कुछ नहीं।
           "पापा,देखो! कितना प्यारा गुलाब है...।" तीन वर्षीय बच्चे को अपनी तारीफ़ करते सुन कर गुलाब गर्व से और तन गया।
           ‘ऐसे ही प्यारे लोग मेरी दोस्ती के क़ाबिल हैं,’ गुलाब ने सोचा और काँटों की ओर देख कर व्यंग्य से मुस्करा दिया।
           "पापा, मैं तोड़ लूँ इसे? अपनी कॉपी में इसकी पंखुड़ियाँ रखूँगा।" बच्चे की बात सुन गुलाब सहम गया,"ओह! कोई तो मुझे तोड़े जाने से बचा लो...। आज ही तो मैने अपनी आँखें खोली हैं। अभी मैने देखा ही क्या है?" गुलाब ने आर्त स्वर में दुहाई दी,"मैं क्या बेमौत कष्टकारी मौत मारा जाऊँगा?"
           "नहीं दोस्त! काँटों की गंभीर आवाज़ सुनाई दी,"तुम चाहे हमें दोस्त समझो या न समझो, पर हम तुम्हारा बाल भी बांका नहीं होने देंगे...।"
           इससे पहले कि बच्चे का हाथ गुलाब तोड़ पाता, काँटों ने अपनी बाँहें फैला दी। बच्चा चीख मारता हुआ, सहम कर वापस चला गया। गुलाब ने चैन की साँस ली।
           थोड़ी देर बाद बगीचे के फूलों के हँसी-ठहाकों में गुलाब और काँटों की सम्मिलित हँसी सबसे तेज़ थी।
           गुलाब अब दुनियादारी सीख चुका था...।



     (सभी चित्र गूगल से साभार)
                                    

Friday, November 11, 2011

कल ही मुझे शुभ समाचार मिला कि आदरणीय कम्बोज अंकल एक नन्ही सी बिटिया के दादा बन गए हैं...| मन ख़ुशी से भर उठा...| वो मासूम बिलकुल एक नन्ही परी सी लग रही है | उस पर जो प्यार उमड़ा , वह एक हाइकु के रूप में आपके सामने पेश कर रही | आप भी इस ख़ुशी के भागीदार बनिए...|



बाँहों में आके
नन्हीं परी मुस्काई                          
खुशियाँ लाई ।









आज गुरु पर्व का पवन अवसर भी है, सो मै इस अवसर पर भी आप के साथ कुछ हाइकु शेयर करना चाहती हूँ...|

गुरुपर्व पर हाइकु
                         प्रियंका गुप्ता

१) मिलजुल के
   लंगर छकते हैं
   बिना भेद के ।

२) जोत उतरी
       ननकाना साहिब
   राह दिखाने ।

३) कोई भी धर्म
    गुरुपर्व का मान
  सबने रखा ।

४) हम मनाते
   पूरी श्रद्धा के साथ
  गुरु जयन्ती ।








Thursday, November 3, 2011

पिछली पोस्ट में मैने आदरणीय काम्बोज जी का एक हाइकु मेरे जन्मदिन के उपलक्ष्य में आप सबके साथ शेयर किया था...। इसी कड़ी में मेरी बड़ी बहन सदृश्य श्रीमती  ऋता शेखर ‘मधु’ जी ने तो मेरे चित्र पर ही खूबसरत से हाइगा रच डाले । वे हाइगा को ही समर्पित ‘हिन्दी-हाइगा’ नाम का एक ब्लॉग चलाती हैं। मैं वैसे तो उन्हें थोड़े समय से ही जानती हूँ, पर इतने वक़्त में ही उन्होंने मुझे एक स्नेह-बन्धन में बाँध लिया है, जो ईश्वर की कृपा से जीवनपर्यन्त अटूट रहेगा...।




Tuesday, November 1, 2011


नमस्कार,
कल यानि ३१ अक्टूबर को मेरा जन्मदिन था। बहुत सारी बधाइयाँ मिली...। बड़ों का आशीर्वाद मिला तो छोटों का स्नेह...। बहुत अच्छा लगता है न...आखिर हम मृत्यु से एक और साल जीत जो जाते हैं...। मैं ऐसे बहुत से लोगों को जानती हूँ जो अपने जन्मदिन पर थोड़े उदास हो जाते हैं, यह सोच कर कि वे बुढ़ापे की ओर एक कदम और बढ़ गए । पर मैं इसका उल्टा सोचती हूँ। मेरे हिसाब से हर जन्मदिन के साथ हमारे अनुभव बढ़ते हैं...हमारी यादों की किताब कुछ और मोटी होती है...भविष्य के प्रति उत्सुकता और अतीत के प्रति हमारा लगाव भी बढ़ता है...। शायद हमारा स्वभाव, पसन्द-नापसन्द भी कुछ बदलने सी लगती है...। सो हर जन्मदिन मेरे लिए और ज़्यादा उत्साह, एक नवीन ताज़गी ले कर आता है...। मैं अपने लक्ष्य के लिए और सचेत होने लगती हूँ...। खैर! ये तो अपना-अपना नज़रिया है। जो चाहे जैसा सोचे, पर हर इंसान हमेशा खुश रहे, महत्वपूर्ण तो यही है।
अब आपसे विदा लेते-लेते मुझे मिला एक बहुत ही खूबसूरत तोहफ़ा मैं आपके साथ बाँटना चाहती हूँ...। जब मेरे जन्मदिन होने की बात आदरणीय रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ जी ( जिन्हें मैं काम्बोज अंकल कहती हूँ), को पता चली, उन्होंने आशीर्वाद-स्वरूप एक बहुत ही खूबसूरत तांका मेरे लिए लिख दिया, साथ में नियाग्रा फ़ॉल के एक पुष्प का सुन्दर सा चित्र भी लगाया। मुझे इतना अच्छा महसूस हुआ कि मैं उसे आपके साथ शेयर करने का लोभ संवरण नहीं कर पाई...। आपको भी वह निश्चय ही पसंद आएगा...।


Friday, October 21, 2011

नमस्कार,
आज मैं आपके सामने अपनी पहली व्यंग्य-कविता लेकर आई हूँ...| प्रतिक्रियाओं का इंतज़ार तो रहेगा, हमेशा की तरह...| उम्मीद है, आपको पसंद आएगी...|
धनतेरस- दीपावली और भैया दूज की अग्रिम शुभकामनाएं...|

व्यंग्य कविता
                           गारन्टी
                                                     प्रियंका गुप्ता

एक दिन/ एक युवक
कुछ घबराया, शरमाया
मेरे पास आया
बोला ‘‘मिस’’
मैने कहा "यस"
बोला " आपका वैवाहिक विज्ञापन पढ़ा है
मुझे अच्छा लगा है
इस लिए खुद ही रेस्पॉन्स देने आया हूँ
साथ में अपना बायोडाटा भी लाया हूँ।"
मैने कहा "सर"
वो बोला "अर‍र"
मैने पूछा "क्या हुआ?"
बोला,"सर न कहें, ऐजेड लगता हूँ
मेरा नाम प्रकाश है, कैसा लगता हूँ?"
मैने कहा "शक्ल-सूरत तो अच्छी है,
पर यह बात तो खरी और सच्ची है,
अपना बायोडाटा सुनाओ
पसन्द आया तो मम्मी को बुलाऊँगी,
वरना बाहर का रास्ता दिखाऊँगी।"
वो बोला,"बायोडाटा तो जी
बस इतना है मेरा
उमर बाइस साल,
ग्रेजुएट, बेरोजगार और ग़रीब हूँ,
सस्ता और टिकाऊ हूँ, 
साथ में सात साल की गारण्टी है।"
मैने पूछा,"किसकी गारण्टी?"
बोला,"आपके जीवन की...।"
मैने कहा," हम समझे नहीं, कैसे?"
बोला,"बड़ी भोली हैं आप, वो ऐसे
कि सात साल तक बीवी गर मर जाए
तो अन्दर हो सकता है पति
दहेज हत्या में...।
इसी लिए मेरा वादा है
सात साल तक
घर में मिट्टी का तेल नहीं लाऊँगा,
आपसे दहेज नहीं मागूँगा,
और सात साल बाद
आपकी टूट-फूट के लिए
मेरी कोई लाइबिल्टी नहीं
आपके फ़रदर एक्स्पेन्सेस बीमा कम्पनी उठाएगी
प्रीमियम आपके फ़ादर ने भरा तो ठीक,
वरना मुझे तो पूरी रकम मिल जाएगी...।"