प्रिय मित्रों,
आज मैं आपके साथ हाल में ही अपनी एक सहेली के साथ हुई एक घटना का जिक्र करना चाहूँगी। बात मेरे ही मोहल्ले की है, सो जो कुछ हुआ उसे काफ़ी हद तक मैने भी देखा और जाना...।
घटना असल में मेरी सहेली के बेटे और मेरी एक दूसरी परिचिता की बेटी से जुड़ी है। एक बहुत ही मामूली सी बात का बतंगड़ कैसे बनाया जाता है, यह घटना इस बात का बहुत ज्वलन्त उदाहरण है। मेरे मोहल्ले में किशोरावस्था में प्रवेश कर चुके बहुत बच्चे हैं, जो शायद तीन-चार साल की उम्र से साथ खेलते बड़े हुए हैं। उनमें से ज्यादातर एक ही स्कूल में पढ़ते भी हैं...कई तो एक ही क्लास में...। सो सब बच्चे एक ही बस में, एक ही स्टॉप से साथ-साथ जाते हैं। लाजमी है कि उनमें दोस्ताना अधिक ही है...। सो बस में भी हँसी-मज़ाक, धौल-धप्पा, एक-दूसरे के साथ सीट लेने की जद्दोजहद दूसरे बच्चों से कुछ ज्यादा ही है...।
तो मैं बात कर रही थी उन लड़का-लड़की की...। लड़की ने अभी पिछले ही साल अपना पुराना स्कूल बदल कर इस लड़के के स्कूल में दाखिला ले लिया। दोनो हमउम्र हैं, सो क्लास भी एक...बस सेक्शन अलग मिले...। किसी को कहीं कुछ भी बदला नहीं लग रहा था...। हाँ, ये दोनो बच्चे ज़रूर खुश हुए कि अब पढ़ाई में और आसानी होगी। एक नागा करेगा तो दूसरा तो है ही मदद को...। बस में भी अब दोनो एक दूसरे के साथ बैठने लगे थे...रास्ते भर कभी पढ़ाई, कभी दोस्तों, तो कभी यूँ ही किसी बात पर चर्चाएँ होने लगी...। स्टॉप पर बेटे को लेने-छोड़ने मेरी सहेली हमेशा जाती है। उन दोनो बच्चों की आपसी छेड़छाड़ में मेरी सहेली या उस स्टॉप पर आने वाली किसी और मम्मी को कभी कोई आपत्तिजनक बात नहीं लगी...न कभी किसी और बच्चे ने उन दोनो की किसी हरकत पर कोई एतराज़ जताया...।
चार-छः महीना सब ठीक ही चल रहा था कि अचानक एक दिन बच्चों की बस बदल कर दूसरी बस आने लगी। बच्चे वही थे, वही स्टॉप और वही माहौल...। पर बस की एक टीचर की नज़र में कुछ भी नॉर्मल नहीं था। मेरी सहेली का बेटा कुछ मज़ाकिया और मिलनसार स्वभाव का है...। माँ ने उसे कभी दुनिया के फ़रेब में नहीं डाला...। हाँ, क्या अच्छा है, क्या बुरा...सही-ग़लत वह उसे हमेशा समझाती है। बच्चों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्द्धा, लड़के-लड़की के बीच स्वस्थ मित्रता के लिए मेरी सहेली ने उसे कभी नहीं रोका...। शायद यही कारण है कि मेरी सहेली को अपने बेटे की सहेलियों के बारे में भी पता है...। उसने कभी बेटे के मन में विपरीत लिंग को लेकर हौव्वा नहीं डाला, क्योंकि उसका मानना है कि वर्ज़ित फल को चखने की चाह इंसान में ज़्यादा ही होती है, सो बेहतर है कि फल को वर्ज़ित करने की बजाय इंसान को यह पता होना चाहिए कि उस फल से क्या लाभ या हानि हो सकती है...ऐसे में इंसान हमेशा अपनी अंतरात्मा की सुनेगा और अंतरात्मा के फैसले ज़्यादातर सही ही होते हैं...। मेरी सहेली ने अपने बेटे को हमेशा अच्छे संस्कार दिए हैं और उसे भरोसा है कि शायद पूरी ज़िन्दगी में यही संस्कार उसे राह दिखाएँगे...।
पर बस में मौज़ूद वह टीचर दुनिया को थोड़े संकीर्ण नज़रिए से परखने पर यकीन करती हैं। उनकी निगाह में किसी भी उम्र के लड़के-लड़की में सिर्फ़ एक ही रिश्ता हो सकता है...ग़लत...। उन्हें दोनो बच्चों के एक साथ बैठने पर एतराज़ हुआ, सहेली को पता चला, उसने समझौतावादी रुख़ अपनाते हुए दोनो बच्चों को अलग बैठने की सलाह दी...। बेकार टीचर को नाराज़ क्यों करें...। उसे यह भी लगा, शायद यह दोनो बहुत शोर मचा लेते होंगे जिससे टीचर परेशान हो जाती होंगी...। पर फिर टीचर ने दोनो की आपसी बोलचाल भी बन्द करने को कह दिया...। पर दुनिया की गन्दी निगाह से बेखबर दोनो बच्चों ने इस बात को गम्भीरता से नहीं लिया। वे दोनो वैसे ही बोलते रहे...। जब वह टीचर अनुपस्थित हो जाती तो दोनो साथ बैठ भी जाते । पर बात उस दिन बिगड़ गई जब करीब आ रहे इम्तहान की तैयारी के लिए लड़के ने स्कूल से तीन दिनों की छुट्टी ले ली। उसकी कम्प्यूटर की कॉपी स्कूल में खो गई थी, सो उसने उस लड़की की कॉपी ली थी। चूँकि उसने वीक-एण्ड में छुट्टी ली थी तो मेरी सहेली ने ही उसे सलाह दी कि बस आने के समय चल कर फोटोकॉपी करा वह कॉपी उस लड़की को स्टॉप पर ही वापस कर दे ताकि उसे भी पढ़ने का हर्जा न हो। बेटे के साथ मेरी सहेली भी स्टॉप पर गई थी । टीचर ने बस रुकने पर मेरी सहेली को पूरी तरह नज़रअन्दाज़ करते हुए निगाह सिर्फ़ दोनो बच्चों पर गड़ाए रखी । उन्होंने मन में पूरी फ़िल्मी कल्पना कर डाली जहाँ हीरो हीरोइन को कुछ दिन न देखने पर बेचैन हो दुनिया की निगाहों से छिप कर उससे मिलने पहुँचता है...मैं तुझसे मिलने आई मन्दिर जाने के बहाने...स्टाइल...।
दूसरे दिन स्कूल पहुँच कर उस टीचर ने यह बात उन बच्चों की क्लास इंचार्ज तक पहुँचा दी...और भी न जाने किस-किस टीचर तक वह बात पहुँची...। क्लास इंचार्ज ने पहले तो उस लड़की को बुला कर सफ़ाई माँगी, फिर उन्होंने अपने सामने उस टीचर द्वारा पेश की गई बात लड़की की मम्मी को फोन करके बताई । इस अचानक वार से बौखलाई मम्मी को कुछ नहीं सूझा तो उन्होंने कह दिया कि वे दोनो बच्चे तो एक-दूसरे के भाई-बहन जैसे हैं...। खैर, उन टीचर ने उन्हें हिदायत दी कि जब तक दूसरी टीचर का शक़ दूर नहीं होता तब तक दोनो बच्चे आपस में बात न करें।
उन परिचिता ने यह बात तुरन्त मेरी सहेली को बताई...। सुन कर मेरी सहेली और उसका बेटा दोनो ही टेन्शन में आ गए...। बच्चा इस बात से परेशान था कि आज तक जैसा व्यवहार वह अपने दोस्तों से करता आ रहा था, वैसा ही तो उसके साथ भी कर रहा था...। फिर ऐसी चक्कर चलने वाली बात बीच में कहाँ से आ गई...? हार कर आखिर मेरी सहेली को भी अपने बेटे से कहना पड़ा कि अब से वह लड़कियों से थोड़ा दूरी ही बना कर चले, वरना आज बात इस लड़की की है, कल को दूसरी होगी...। इस बात का असर उन बच्चों पर इतना गहरा पड़ा कि जो बच्चे सहजता से एक-दूसरे के साथ हँस-बोल रहे थे, वही अपराधी की तरह आमना-सामना होने पर एक-दूसरे से मुँह फेर कर बैठ गए...। यही नहीं, बल्कि उसे बड़ा जान कर स्टॉप की एक मम्मी ने अपनी पाँच साल की बेटी का बस में ध्यान रखने की जिम्मेदारी मेरी सहेली के बेटे को दे रखी थी, उसने अब वह भी लेने से इंकार कर दिया यह कहते हुए कि ‘आण्टी, इसे मैं बच्चा समझ कर कई बार अपने ही पास बैठा लेता हूँ, पर किसी दिन मैम इसे लेकर भी मेरी बेइज्ज़ती न कर दें...। आप इसको देखे रहने का जिम्मा किसी और को सौंप दीजिए...।’
आगे क्या होगा, हम नहीं जानते...पर मेरी सहेली ने जो सवाल मेरे सामने उठाए, उन्हीं सवालों को मैं आपसे भी करना चाहूँगी कि क्या इस दृष्टिकोण से हम बच्चों के साफ़, स्वस्थ मस्तिष्क में एक ग़लत बात नहीं भर रहे...? जिन बच्चों ने आपस में हँसते-खेलते समय शायद एक-दूसरे को इस नज़र से देखा भी नहीं हो, उन्हें अपराधी महसूस करा कर क्या हम आइन्दा उन्हें विपरीत सेक्स के साथ सहज रहने की हिम्मत दे पाएँगे...? क्या एक लड़के और लड़की की स्वस्थ दोस्ती को भी समाज की बुरी नज़र से बचाने के लिए उसे भाई-बहन का नाम देना ज़रूरी है...? क्या वह टीचर पूरे स्कूल में उनकी बदनामी कर के अपना अच्छे शिक्षक होने का दायित्व पूरा कर रही हैं...? क्या यह लिंग-भेद को बढ़ावा नहीं कि अब वे ही नहीं, बल्कि इस घटना से वाकिफ़ हो चुके उस स्टॉप के बाकी बच्चे भी आपस में बोलने या बैठने से पहले यह देखने लगे हैं कि वे किसके साथ बैठ रहे...? क्या अब दो दोस्त सिर्फ़ इस कारण एक-दूसरे की मदद नहीं करेंगे कि उनमें से एक लड़का है तो दूसरी लड़की...?
इन सवालों के जवाब क्या होंगे, इनकी प्रतीक्षा मुझे भी रहेगी...।
.jpg)








